స్తోత్రం

Sundarkand

सुन्दरकाण्ड

जब लगि आवौं सीतहि देखी।

होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी॥

यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा।

चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा॥

सिंधु तीर एक भूधर सुंदर।

कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर॥

बार-बार रघुबीर सँभारी।

तरकेउ पवनतनय बल भारी॥

जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता।

चलेउ सो गा पाताल तुरंता॥

जिमि अमोघ रघुपति कर बाना।

एही भाँति चलेउ हनुमाना॥

जलनिधि रघुपति दूत बिचारी।

तैं मैनाक होहि श्रम हारी॥

श्री राम चरित मानस-सुन्दरकाण्ड (दोहा 1 - दोहा 6)

दोहा 1

हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम,

राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम।

चौपाई

जात पवनसुत देवन्ह देखा।

जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा॥

सुरसा नाम अहिन्ह कै माता।

पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता॥

आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा।

सुनत बचन कह पवनकुमारा॥

राम काजु करि फिरि मैं आवौं।

सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं॥

तब तव बदन पैठिहउँ आई।

सत्य कहउँ मोहि जान दे माई॥

कवनेहुँ जतन देइ नहिं जाना।

ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना॥

जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा।

कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा॥

सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ।

तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ॥

जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा।

तासु दून कपि रूप देखावा॥

सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा।

अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा॥

बदन पइठि पुनि बाहेर आवा।

मागा बिदा ताहि सिरु नावा॥

मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा।

बुधि बल मरमु तोर मैं पावा॥

दोहा 2

राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान,

आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान।

चौपाई

निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई।

करि माया नभु के खग गहई॥

जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं।

जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं॥

गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई।

एहि बिधि सदा गगनचर खाई॥

सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा।

तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा॥

ताहि मारि मारुतसुत बीरा।

बारिधि पार गयउ मतिधीरा॥

तहाँ जाइ देखी बन सोभा।

गुंजत चंचरीक मधु लोभा॥

नाना तरु फल फूल सुहाए।

खग मृग बृंद देखि मन भाए॥

सैल बिसाल देखि एक आगें।

ता पर धाइ चढ़ेउ भय त्यागें॥

उमा न कछु कपि कै अधिकाई।

प्रभु प्रताप जो कालहि खाई॥

गिरि पर चढ़ि लंका तेहिं देखी।

कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी॥

अति उतंग जलनिधि चहु पासा।

कनक कोट कर परम प्रकासा॥

छन्द

कनक कोटि बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना,

चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना।

गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथन्हि को गनै,

बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै॥१॥

बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं,

नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं।

कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं,

नाना अखारेन्ह भिरहिं बहुबिधि एक एकन्ह तर्जहीं॥२॥

करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं,

कहुँ महिष मानुष धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं।

एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही,

रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही॥३॥

दोहा 3

पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार,

अति लघु रूप धरों निसि नगर करौं पइसार।

चौपाई

मसक समान रूप कपि धरी।

लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी॥

नाम लंकिनी एक निसिचरी।

सो कह चलेसि मोहि निंदरी॥

जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा।

मोर अहार जहाँ लगि चोरा॥

मुठिका एक महा कपि हनी।

रुधिर बमत धरनीं ढनमनी॥

पुनि संभारि उठी सो लंका।

जोरि पानि कर बिनय ससंका॥

जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा।

चलत बिरंच कहा मोहि चीन्हा॥

बिकल होसि तैं कपि कें मारे।

तब जानेसु निसिचर संघारे॥

तात मोर अति पुन्य बहूता।

देखेउँ नयन राम कर दूता॥

दोहा 4

तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग,

तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग।

चौपाई

प्रबिसि नगर कीजे सब काजा।

हृदयँ राखि कोसलपुर राजा॥

गरल सुधा रिपु करहिं मिताई।

गोपद सिंधु अनल सितलाई॥

गरुड़ सुमेरु रेनु सम ताही।

राम कृपा करि चितवा जाही॥

अति लघु रूप धरेउ हनुमाना।

पैठा नगर सुमिरि भगवाना॥

मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा।

देखे जहँ तहँ अगनित जोधा॥

गयउ दसानन मंदिर माहीं।

अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं॥

सयन किएँ देखा कपि तेही।

मंदिर महुँ न दीखि बैदेही॥

भवन एक पुनि दीख सुहावा।

हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा॥

दोहा 5

रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ,

नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरष कपिराई।

चौपाई

लंका निसिचर निकर निवासा।

इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा॥

मन महुँ तरक करैं कपि लागा।

तेहीं समय बिभीषनु जागा॥

राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा।

हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा॥

एहि सन सठि करिहउँ पहिचानी।

साधु ते होइ न कारज हानी॥

बिप्र रूप धरि बचन सुनाए।

सुनत बिभीषन उठि तहँ आए॥

करि प्रनाम पूँछी कुसलाई।

बिप्र कहहु निज कथा बुझाई॥

की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई।

मोरें हृदय प्रीति अति होई॥

की तुम्ह रामु दीन अनुरागी।

आयहु मोहि करन बड़भागी॥

दोहा 6

तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम,

सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम।

चौपाई

सुनहु पवनसुत रहनि हमारी।

जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी॥

तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा।

करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा॥

तामस तनु कछु साधन नाहीं।

प्रीत न पद सरोज मन माहीं॥

अब मोहि भा भरोस हनुमंता।

बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता॥

जौं रघुबीर अनुग्रह कीन्हा।

तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा॥

सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती।

करहिं सदा सेवक पर प्रीति॥

कहहु कवन मैं परम कुलीना।

कपि चंचल सबहीं बिधि हीना॥

प्रात लेइ जो नाम हमारा।

तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा॥

अगला दोहा 7-12

भगवान हनुमान से सम्बन्धित अन्य पृष्ठ

भगवान हनुमान

प्रस्तुत लेख में भगवान हनुमान के विषय में विस्तृत वर्णन किया गया है। श्री हनुमान जी, हिन्दु धर्म में पूजे जाने वाले सर्वाधिक लोकप्रिय देवताओं में से एक हैं। हनुमान जी को

महावीर, बजरंगबली, आञ्जनेय

तथा

पवनपुत्र

आदि नामों से भी जाना जाता है।

हनुमान जयन्ती के विषय में

भगवान हनुमान के जन्मदिवस को हनुमान जयन्ती के रूप में मनाया जाता है। हिन्दु कैलेण्डर के अनुसार, उत्तर भारत में चैत्र माह की पूर्णिमा तिथि पर मनाया जाता है। हनुमान जयन्ती को विभिन्न क्षेत्रों में

हनुमथ जयन्थी

एवं

हनुमान व्रतम्

के रूप में मनाया जाता है।

हनुमान जयन्ती

हनुमान जयन्ती, भगवान हनुमान जी के जन्म के उपलक्ष्य में मनायी जाती है। हनुमान जी को वानर देवता के रूप में भी जाना जाता है। सम्पूर्ण भारत में व्यापक रूप से हनुमान जी की पूजा की जाती है। प्रस्तुत लेख में

हनुमान जयन्ती

की

तिथि एवं समय

प्रदान किया गया है।

हनुमान आरती

आरती कीजै हनुमान लला की

दुष्ट दलन रघुनाथ कला की॥

यह श्री हनुमान जी को समर्पित सर्वाधिक प्रचलित एवं लोकप्रिय आरती है। इस मधुर आरती का गायन हनुमान जी से सम्बन्धित विभिन्न अवसरों पर किया जाता है। यह आरती हनुमान जी के दैनिक पूजन में भी गायी जाती है।

हनुमान चालीसा

जय हनुमान ज्ञान गुण सागर।

जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥

उपरोक्त हनुमान चालीसा भगवान हनुमान को समर्पित सर्वाधिक लोकप्रिय स्तुति है, जिसका गायन हनुमान भक्तों द्वारा प्रतिदिन किया जाता है। चालीस चौपाईयाँ से युक्त होने के कारण इस प्रार्थना को चालीसा कहा जाता है।

तमिल हनुमथ जयन्थी

तमिल कैलेण्डर के अनुसार हनुमान जयन्ती

मार्गशीर्ष अमावस्या

के दिन मनायी जाती है।

तमिल नाडु

में हनुमान जयन्ती को हनुमथ जयन्थी के रूप मनाया जाता है। मान्यताओं के अनुसार, मार्गशीर्ष अमावस्या के दिन

मूल नक्षत्र

में हनुमान जी का जन्म हुआ था।

हनुमान के 108 नाम

1.

ॐ आञ्जनेयाय नमः।

2.

ॐ महावीराय नमः।

3.

ॐ हनुमते नमः।

...

107.

ॐ जाम्बवत्प्रीतिवर्धनाय नमः।

108.

ॐ सीतासमेत श्रीरामपाद सेवदुरन्धराय नमः।

आदि हनुमान जी के 108 नाम, अर्थात हनुमान अष्टोत्तर शतनामावली अर्थ एवं वीडियो सहित प्रस्तुत हैं।

हनुमान जयन्ती ई-कार्ड्स

हनुमान जयन्ती के ग्रीटिंग्स एवं ई-कार्ड्स के माध्यम से आप अपने प्रियजनों को हनुमान जयन्ती की शुभकामनायें प्रेषित कर सकते हैं। इन शुभकामना सन्देशों में दिये गये चित्रों में,

हनुमान जी को पर्वत ले जाते हुये

,

आशीर्वाद देते हुये

तथा

पूँछ के आसन पर विराजमान

दर्शाया गया है।

हनुमान पूजा विधि

भगवान हनुमान जी की प्रसन्नता एवं कृपा प्राप्त करने हेतु

षोडशोपचार हनुमान पूजा विधि

द्वारा उनका पूजन किया जाता है। प्रस्तुत हनुमान पूजा विधि में

सङ्कल्प, आवाहन, ध्यान, आसन, पाद्य, अर्घ्य

आदि पूजा के सोलह चरणों को सम्मिलित किया गया है।

दीवाली हनुमान पूजा

उक्त लेख में

दीपावली पर हनुमान पूजा मुहूर्त

दिया गया है। भारत के कुछ क्षेत्रों में दीवाली पूजा से एक दिन पूर्व

काली चौदस

के दिन हनुमान जी की पूजा की जाती है। इस अवसर पर अयोध्या स्थित प्रसिद्ध

हनुमानगढ़ी

मन्दिर में भव्य रूप से श्री हनुमान जन्मोत्सव का आयोजन किया जाता है।

तेलुगु हनुमान जयन्थी

आन्ध्र प्रदेश

एवं

तेलंगाना

में तेलुगु कैलेण्डर के अनुसार हनुमान जयन्ती मनायी जाती है। तेलुगु हनुमान जयन्ती चैत्र पूर्णिमा से आरम्भ होकर 41 दिनों तक मनाई जाती है। प्रस्तुत लेख में

तेलुगु हनुमान जयन्ती मुहूर्त

एवं

दीक्षा आरम्भ

का समय प्रदान किया गया है।

भगवान हनुमान मन्त्र

प्रस्तुत हनुमान मन्त्रों की सूची में

श्री हनुमान मूल मन्त्र

,

हनुमान गायत्री मन्त्र

एवं

मनोजवम् मारुततुल्यवेगम् मन्त्र

प्रदान किये गये हैं। इन मन्त्रों का निष्ठापूर्वक जाप करने से हनुमान जी प्रसन्न होकर साधक पर कृपा करते हैं।

श्री हनुमान यन्त्र

हनुमान पूजा के लिए पूर्ण आकार का

श्री हनुमान यन्त्र वॉलपेपर

यहाँ प्रदान किया गया है। उक्त चित्र को मुद्रित करवाकर, पूजा के लिये प्रयोग किया जा सकता है। हिन्दु धर्म में प्रतिष्ठित यन्त्र को साक्षात् सम्बन्धित देवता का ही रूप मानकर उसकी पूजा-अर्चना की जाती है।

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