थाई अमावसई

इसे यह भी कहा जाता है: थाई अमावस्या

थाई अमावसई तमिल पंचांग में उत्तरायण की पहली अमावस्या है, जो थाई माह में आती है, जिसका आरंभ मकर संक्रांति से होता है। पोंगल के कुछ ही समय बाद मनाया जाने वाला यह पर्व सूर्य की उत्तर दिशा की यात्रा शुरू होने पर कृतज्ञतापूर्वक पितरों का सम्मान करता है, जो जीवन में नवचेतना और कृषि में समृद्धि लाता है।

मुख्य तथ्य

पक्ष
कृष्ण पक्ष
चंद्र मास
थाई (तमिल सौर माह, मध्य-जनवरी से मध्य-फरवरी)
देवता
दिवंगत पूर्वज (पितर), सूर्य देव, भगवान शिव

कथा

मंदिर परंपराओं में उत्तरायण को देवताओं के दिन का प्रभात माना जाता है। इस संधिकाल पर तर्पण अर्पित करने से आत्माओं की आगे की आध्यात्मिक उन्नति में सहायता मिलती है।

नियम व परंपराएं

  • सुबह जल्दी पवित्र नदियों, समुद्र या मंदिर के कुंडों में स्नान करना
  • काले तिल, कच्चे चावल और कुशा घास से तर्पण करना
  • निर्धनों को भोजन कराना और गायों को हरी घास खिलाना (गो पूजा)

क्षेत्रीय विविधताएं

  • रामेश्वरम, तिरुवारूर के पास तिला तर्पणपुरी, भवानी कूडुथुरई और कावेरी के तटों पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटती है

सामान्य प्रश्न

थाई अमावसई का उत्तरायण से क्या संबंध है?
यह सूर्य के उत्तरायण (उत्तर दिशा की ओर गमन) की पहली अमावस्या है, जो नवजीवन, स्पष्टता और पितरों की सद्गति का प्रतीक है।

अमावस्या के प्रकार