गोवत्स द्वादशी

इसे यह भी कहा जाता है: वसु बारस, वाघ बारस, बछ बारस, नंदिनी व्रत

गोवत्स द्वादशी धनतेरस और दिवाली से पहले कृष्ण पक्ष की द्वादशी को आती है। यह गायों और बछड़ों की पूजा को समर्पित है, जो मातृ-पोषण, सौम्यता और समृद्धि के साक्षात प्रतीक हैं। माताएं अपनी संतानों के स्वास्थ्य और दीर्घायु की प्रार्थना करते हुए नंदिनी व्रत रखती हैं।

मुख्य तथ्य

पक्ष
कृष्ण पक्ष
चंद्र मास
आश्विन (अमावस्यांत); कार्तिक (पूर्णिमांत)
देवता
कामधेनु (पवित्र गाय), नंदिनी (बछिया), भगवान कृष्ण

कथा

भविष्य पुराण में वर्णन मिलता है कि राजा उत्तानपाद और उनकी रानी सुनीति ने अत्यंत श्रद्धा के साथ कामधेनु की पुत्री नंदिनी की पूजा करते हुए गोवत्स द्वादशी का व्रत किया था। उनकी इस भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें ध्रुव के रूप में एक श्रेष्ठ पुत्र प्राप्त हुआ, जो भक्ति के अमर आदर्श बने।

नियम व परंपराएं

  • गायों और बछड़ों को स्नान कराना और उन्हें हल्दी, सिंदूर, फूलों की मालाओं तथा घंटियों से सजाना
  • गायों को ताजी हरी घास, अंकुरित मूंग और गुड़ खिलाना
  • इस दिन गाय के दूध, दही, घी और गेहूं से बने उत्पादों का सेवन न करना
  • शाम के समय गौशालाओं में मिट्टी के दीये जलाना

क्षेत्रीय विविधताएं

  • महाराष्ट्र में इसे दिवाली पर्व की शुरुआत के रूप में वसु बारस के नाम से मनाया जाता है; गुजरात में इसे वाघ बारस के रूप में मनाया जाता है

सामान्य प्रश्न

गोवत्स द्वादशी पर गाय के दूध से बनी चीजों का परहेज क्यों किया जाता है?
श्रद्धालु आदर और श्रद्धा भाव से गाय के दूध और घी का त्याग करते हैं, ताकि इस पावन दिन पर माता गाय का पूरा दूध केवल बछड़े को ही मिले।

द्वादशी के प्रकार