मारे मंदिरीए आज कीधा छे भोजनिया मन भावता।
व्हेलारे आवजो गणपति बाप्पा वार न लागे आवता ॥धृ॥
स्वागतमां पुष्पोंनी माळा तैयार छे।
कमळ कळीयोथी में गूंथेलो हार छे।
आनंद आनंद थाशे हैयामां मेठा थकी पहरावता।
व्हेलारे आवजो गणपति बाप्पा वार न लागे आवता ॥१॥
रूपाना बाजोटने कंचननो थाळ छे।
स्नेही भरी सामग्री सघळी तैयार छे।
एक पछी एक हुं पीरसुं माडुं आवे उछळो धरावता।
व्हेलारे आवजो गणपति बाप्पा वार न लागे आवता ॥२॥
बुंदीना लाडुने मावानी धारी।
पीस्तानी बर्फी ने सेव सुवाळी।
प्रेमे आरोगजो लचपचता लाडुं थाक लाग्यो छे वाळता।
व्हेलारे आवजो गणपति बाप्पा वार न लागे आवता ॥३॥
दुधीनो हलवो ने पूरणपोळी।
बे पडी रोटली ने धीमां जबोळी।
मगज मेसुब मोहनथाळ छे वार लागी छे ठारता।
व्हेलारे आवजो गणपति बाप्पा वार न लागे आवता ॥४॥
शाक कर्या छे मेतो विविध जातना।
करवा वखाण शुं केसरीया भातना।
कढीने दाळ केरी वात नीराळी महक आवे छे वधारता।
व्हेलारे आवजो गणपति बाप्पा वार न लागे आवता ॥५॥
जळ मारा घरनुं छे जमुनानुं जाणजो।
मुखवास करीने मांडीवात मारी माणजो।
राम भक्त घरे तमे रोज रोज आवजो थाकुं न तमने जमाडता।
व्हेलारे आवजो गणपति बाप्पा वार न लागे आवता ॥६॥