काल भैरव जयंती

इसे यह भी कहा जाता है: भैरव अष्टमी, महा कालाष्टमी

यह उस वार्षिक प्राकट्य दिवस का प्रतीक है जब भगवान काल भैरव, देवाधिदेव शिव के तीसरे नेत्र से प्रकट हुए थे। वाराणसी और उज्जैन में इसे भैरव उपासना के सर्वोच्च पर्व के रूप में अपार श्रद्धा व उत्साह के साथ मनाया जाता है।

मुख्य तथ्य

पक्ष
कृष्ण पक्ष
चंद्र मास
मार्गशीर्ष (पूर्णिमांत); कार्तिक (अमावस्यांत)
देवता
भगवान काल भैरव

कथा

शतरुद्र संहिता में ब्रह्मा और विष्णु के मध्य हुए संवाद के समय भैरव के प्राकट्य, अहंकार का नाश करने के लिए ब्रह्मा जी के पांचवें सिर के छेदन, तथा काशी तक की उनकी यात्रा और वहां कोतवाल के रूप में प्रतिष्ठित होने का पूर्ण वर्णन मिलता है।

नियम व परंपराएं

  • मध्यरात्रि में पंचामृत, सरसों के तेल और सुगंधित जल से विधिपूर्वक अभिषेक करना
  • पारंपरिक प्रथा के अनुसार मीठी मदिरा, उड़द दाल के पकौड़े और लाल पुष्पों की माला अर्पित करना
  • ढोल-डमरू की ध्वनि और निरंतर स्तोत्र पाठ के साथ रात्रि जागरण करना

क्षेत्रीय विविधताएं

  • वाराणसी और शक्तिपीठों में भव्य मंदिर उत्सव, रजत मुखौटा शोभायात्रा और भंडारों का आयोजन

सामान्य प्रश्न

काल भैरव को काशी का कोतवाल क्यों कहा जाता है?
भगवान शिव ने उन्हें काशी का सर्वोच्च आध्यात्मिक रक्षक (कोतवाल) नियुक्त किया था, जिनकी आज्ञा के बिना कोई भी जीवात्मा वहां न तो निवास कर सकती है और न ही मुक्ति पा सकती है।

कालाष्टमी के प्रकार