आश्विन पूर्णिमा
इसे यह भी कहा जाता है: शरद पूर्णिमा, कोजागरी पूर्णिमा, रास पूर्णिमा
शरद पूर्णिमा को वर्ष की सबसे चमकीली पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है, जो शरद ऋतु के आगमन का संकेत देती है। ऐसी मान्यता है कि इस रात चंद्रमा अपनी किरणों से अमृत बरसाता है। बंगाल और पूर्वी भारत में रातभर जागरण करके कोजागरी लक्ष्मी पूजा की जाती है। वैष्णव परंपरा में यह वृंदावन के दिव्य महारास की पावन स्मृति का पर्व है।
मुख्य तथ्य
- पक्ष
- शुक्ल पक्ष
- चंद्र मास
- आश्विन
- देवता
- देवी लक्ष्मी, भगवान कृष्ण, चंद्र देव
कथा
मान्यता है कि इस रात देवी लक्ष्मी घर-घर जाकर पूछती हैं 'को जागर्ति?' ('कौन जाग रहा है?'), और जो लोग जागरण व प्रार्थना में लीन होते हैं, उन्हें धन-धान्य और समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं। वृंदावन में भगवान श्री कृष्ण ने अपनी दिव्य बांसुरी बजाकर गोपियों को प्रेम के शाश्वत दिव्य नृत्य (महारास) के लिए आमंत्रित किया था।
नियम व परंपराएं
- चावल की खीर बनाकर रातभर चांदनी में रखना ताकि वह चंद्रमा की औषधीय किरणों को सोख सके
- भजन-कीर्तन और धार्मिक ग्रंथों के पाठ के साथ रात्रि जागरण करना
- अगली सुबह चांदनी में रखी शीतल खीर को पावन प्रसाद के रूप में ग्रहण करना
क्षेत्रीय विविधताएं
- बंगाल और ओडिशा में कोजागरी पूर्णिमा के रूप में मनाई जाती है; वृंदावन और गुजरात में रासलीला के आयोजनों के साथ मनाई जाती है
सामान्य प्रश्न
- शरद पूर्णिमा पर खीर को चांदनी में क्यों रखा जाता है?
- पारंपरिक आयुर्वेद और लोक-मान्यता के अनुसार शरद पूर्णिमा के चंद्रमा की किरणों में औषधीय और शीतलता प्रदान करने वाले गुण होते हैं, जो दूध और चावल के पोषक तत्वों को बढ़ा देते हैं।