श्रावण पूर्णिमा
इसे यह भी कहा जाता है: रक्षाबंधन, नारली पूर्णिमा, गायत्री जयंती, अवनि अवित्तम
यह विविध परंपराओं से जुड़ा एक पावन दिन है। उत्तर और पश्चिम भारत में बहनें अपने भाइयों की कलाई पर पवित्र रक्षासूत्र (राखी) बांधकर आपसी स्नेह और सुरक्षा का उत्सव मनाती हैं। तटीय क्षेत्रों में मछुआरा समुदाय समुद्र के देवता वरुण देव को नारियल अर्पित कर नारली पूर्णिमा मनाता है। वहीं ब्राह्मणों के लिए यह उपाकर्म / अवनि अवित्तम का दिन है, जिस दिन यज्ञोपवीत (जनेऊ) का वार्षिक नवीनीकरण किया जाता है।
मुख्य तथ्य
- पक्ष
- शुक्ल पक्ष
- चंद्र मास
- श्रावण
- देवता
- देवी गायत्री, वरुण देव, भगवान हयग्रीव
कथा
भविष्य पुराण में वर्णन मिलता है कि युद्ध में जाने से पहले इंद्राणी ने देवराज इंद्र की कलाई पर एक पवित्र रक्षा-सूत्र (रक्षा) बांधा था, जिससे उनकी विजय सुनिश्चित हुई। तटीय लोक-मान्यता के अनुसार, समुद्र को नारियल अर्पित करने से मानसून का उफनता सागर शांत हो जाता है और मछली पकड़ना फिर से शुरू किया जा सकता है।
नियम व परंपराएं
- राखी बांधना, उपहारों का आदान-प्रदान करना और मिठाइयां बांटना
- कामोकार्षीत् जप के साथ यज्ञोपवीत का विधिवत नवीनीकरण
- पश्चिमी समुद्र तट पर सागर में श्रीफल (नारियल) अर्पित करना
- गायत्री जयंती पर गायत्री मंत्र का जप
क्षेत्रीय विविधताएं
- उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में इसे सलोनो, तमिलनाडु में अवनि अवित्तम, तथा महाराष्ट्र और गोवा में नारली पूर्णिमा कहा जाता है
सामान्य प्रश्न
- उपाकर्म क्या है?
- उपाकर्म एक पारंपरिक वैदिक अनुष्ठान है जिसमें वेदपाठी विद्यार्थी व द्विज वैदिक अध्ययन के प्रति अपने संकल्प का नवीनीकरण करते हैं और नया यज्ञोपवीत धारण करते हैं।