ज्येष्ठ पूर्णिमा
इसे यह भी कहा जाता है: वट पूर्णिमा, देवस्नान पूर्णिमा
महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत में सुहागिन महिलाएं इस दिन वट पूर्णिमा का व्रत रखती हैं, जिसमें वे सावित्री की भक्ति से प्रेरणा लेकर पवित्र वट वृक्ष (बरगद) की पूजा करती हैं और अपने पति की लंबी आयु की प्रार्थना करती हैं। ओडिशा में इसे देवस्नान पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है, जिस दिन पुरी में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा का भव्य औपचारिक सार्वजनिक स्नान होता है।
मुख्य तथ्य
- पक्ष
- शुक्ल पक्ष
- चंद्र मास
- ज्येष्ठ
- देवता
- देवी सावित्री, भगवान जगन्नाथ, भगवान सत्यनारायण
कथा
महाभारत में वर्णन है कि कैसे सावित्री ने अपनी अटूट पतिभक्ति और तीक्ष्ण बुद्धि से मृत्यु के देवता यमराज को एक वट वृक्ष के नीचे अपने मृत पति सत्यवान के प्राण लौटाने पर विवश कर दिया था। वहीं पुरी में मंदिर की परंपरा के अनुसार यह पवित्र विग्रहों का प्राकट्य दिवस माना जाता है।
नियम व परंपराएं
- वट वृक्ष के तने पर सात बार कच्चा सूत लपेटना
- आम, कटहल जैसे मौसमी ग्रीष्मकालीन फल और भीगे हुए काले चने अर्पित करना
- पुरी में 108 कलश पवित्र सुगंधित जल से भगवान जगन्नाथ का स्नान, जिसके बाद गजानन (हाथी) वेश धारण कराया जाता है
क्षेत्रीय विविधताएं
- उत्तर भारत में वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ अमावस्या को रखा जाता है, जबकि पश्चिम और दक्षिण भारत में इसे ज्येष्ठ पूर्णिमा को मनाया जाता है
सामान्य प्रश्न
- उत्तर और पश्चिम भारत में वट सावित्री अलग-अलग दिनों पर क्यों मनाई जाती है?
- यह क्षेत्रीय परंपरा का भेद है, पंचांग प्रणाली का नहीं। उत्तर भारत में यह व्रत ज्येष्ठ अमावस्या को रखा जाता है, जबकि पश्चिम और दक्षिण भारत में लगभग दो सप्ताह बाद ज्येष्ठ पूर्णिमा को मनाया जाता है।