भाद्रपद पूर्णिमा
इसे यह भी कहा जाता है: भाद्री पूर्णिमा, उमा महेश्वर व्रत
भाद्रपद पूर्णिमा गणेशोत्सव के उल्लासपूर्ण समापन और पितृ पक्ष के पवित्र पखवाड़े के आरंभ का संधिकाल है। यह पूर्णिमा श्राद्ध का निर्धारित दिन है, जिसमें पूर्णिमा तिथि को दिवंगत हुए पूर्वजों का तर्पण व श्राद्ध किया जाता है। दांपत्य जीवन में सुख-शांति के लिए इस दिन उमा महेश्वर व्रत भी रखा जाता है।
मुख्य तथ्य
- पक्ष
- शुक्ल पक्ष
- चंद्र मास
- भाद्रपद
- देवता
- उमा-महेश्वर (शिव-पार्वती), पितृगण (पूर्वज), भगवान सत्यनारायण
कथा
भविष्य पुराण में इस पूर्णिमा पर शिव और पार्वती की उमा-महेश्वर के रूप में पूजा का वर्णन मिलता है, जो यह दर्शाता है कि वैवाहिक सुख आपसी आदर, विनम्रता और संयुक्त आध्यात्मिक साधना से फलता-फूलता है।
नियम व परंपराएं
- काले तिल, कुशा और जल से पूर्णिमा श्राद्ध संपन्न करना
- भगवान शिव और माता पार्वती का संयुक्त पूजन
- ब्राह्मणों और जरूरतमंदों को अन्न व पीतल के बर्तनों का दान
क्षेत्रीय विविधताएं
- पूर्वी, उत्तरी और पश्चिमी भारत में इसे महालय श्राद्ध की शुरुआत के रूप में माना जाता है
सामान्य प्रश्न
- भाद्रपद पूर्णिमा पर श्राद्ध किसे करना चाहिए?
- जिनके माता-पिता या पूर्वजों का देहावसान किसी भी पूर्णिमा तिथि पर हुआ हो, उनके वंशज इस दिन उनका वार्षिक श्राद्ध कर्म करते हैं।